एक कवि की जीवन-वृतः

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मेरा नाम घनश्याम दास बंसल है | मैं  71 वर्ष का हूँ और मुझे कविता लिखने का शौक है | मैं वैसे तो उत्तर प्रदेश के जिला बुलन्दशहर के एक छोटे कस्बे सिकन्द्राबाद का रहने वाला हूँ , परन्तु पिछले लगभग 30  वर्षो से नोएडा में आवास है |

स्नातक स्तर तक मेरी शिक्षा मेरे शहर सिकन्द्राबाद में हुई | 12 वी स्तर तक वाणिज्य (कॉमर्स), फिर 1967 मेँ स्नातक परीक्षा आर्ट्स में पूरी की क्योंकि शहर में बी.कॉम नहीं था | इसके बाद मैंने मोदी नगर मे मोदी स्टील्स के स्टोर्स डिपार्टमेंट मे क्लर्क की तरह काम किया और मेरठ विश्वविद्यालय के गोपनीय विभाग (कॉन्फिडेंटिअल डिपार्टमेंट) में सीनियर असिस्टेंट के रूप में कार्य किया | उसके बाद 1970 से 2003 तक भारतीय रिज़र्व बैंक में रहा व उसी संस्था के नयी दिल्ली कार्यालय से सहायक प्रबन्धक (असिस्टेंट मैनेजर) के रूप में  सेवा – निवृत हुआ |

मैं एक कवि हूँ

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मैं हमेशा से हिन्दी साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ , सो मेरी आरम्भ से ही हिन्दी में लेख लिखने , कविताएँ लिखने व वाद विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेने की रूचि रही है |

मैं दिल से एक कवि हूँ और लगभग 35 वर्षो से कविताएं लिख रहा हूँ | मैं अपनी कविताओं की प्रेरणा अपने चारो तरफ घटित होने वाली सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और पर्यावरण सम्बंधित बातों से लेता हूँ |

मुझे जहाँ भी अपनी कविता सुनाने का अवसर मिला है मैंने उसमे पुरे मन से भाग लिया है और कई बार पुरस्कृत भी हुआ हूँ |

 

 

 

मेरे संघर्ष और उपलब्धियाँ

मेरा विचार है कि संघर्ष ही व्यक्तित्व को निखारता है , उसे मजबूत, जुझारू,सहनशील एवं दुनिया को समझने लायक बनाकर अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाता है| मेरे  बचपन में भी मुझे आर्थिक संघर्षों से जूझना पड़ा  इसलिए मैं अपने मन – माफिक पढ़ाई नहीं कर पाया और बाद में घर की सबसे बड़ी संतान होने के कारण घर व सभी छोटे भाई बहनो का ध्यान रखने का दायित्व भी आया | मुझे इस बात की ख़ुशी एवं आत्म-संतोष है की मैं इस परीक्षा में पूरी तरह खरा एवं पूर्ण सफल रहा | इसे ही मैं अपनी सच्ची उपलब्धि मानता हूँ कि किसी को भी मुझसे शिकायत नहीं रही |

मेरी उपलब्धियों के पीछे दो महान पुरुषों के जीवन से ली गयी सीखो का बहुत बड़ा प्रभाव हैं | ऐतिहासिक व्यक्तियों में मुझे सब से अधिक सम्राट अशोक ने  तथा आधुनिक समय में स्व श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की सादगी एवं ईमानदारी ने प्रभावित किया है और ये दोनों ही मेरे रोल मॉडल भी है | जहाँ अशोक ने अहिंसा, प्रेम, युद्ध की निस्सारिता का उदाहरण पेश किया वही शास्त्री जी का जीवन ही स्वयं में अनुकरणीय रहा है |

मेरा परिवार

pic 5pic 4मेरे परिवार में सबसे अच्छी बात यह रही है कि मेरे पिताजी के समय से लेकर आजतक; यद्पि अब मेरी तीसरी पीढ़ी चल रही है; पूरी तरह से प्रेम-भाव एवं एक दूसरे का सम्मान करने की परम्परा रही है | आज मेरे परिवार में दो पुत्र व बहुएँ एवं चार पोते पोतियां हैं | ईश्वर की कृपा से सभी बच्चे स्कूल की पढ़ाई एवं अन्य सभी गतिविधियों में बहुत अच्छा कर रहे हैं | बेटे व बहुएँ सभी उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और अपने कार्य में सफलता प्राप्त कर रहे है |

बचपन की यादें

मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आती है जब मैं कक्षा 8 का विद्यार्थी था | वैसे हमारे परिवार में मेरे बचपन से कड़ा अनुशासन रहा है | एक दिन मेरी कक्षा के कुछ साथी फिल्म देखने जा रहे थे, उन लोगो ने मुझे भी साथ चलने को कह, मैंने कहा मैं  घर में बड़ो से पूछकर ही जा सकूंगा | जब मैंने घर पर पूछा तो मुझे अनुमति नहीं मिली और डाँट भी पड़ी | उन दिनों हमारे घरों में फिल्म, नाच – गाने जैसी चीज़ देखना अच्छा नहीं मानते थे | सो मैं उसके बाद अपनी 20 साल की आयु तक कोई भी फिल्म नहीं देख सका |

स्वस्थ जीवन जीने का मंत्र

pic 8मेरे हिसाब से एक स्वस्थ एवं सक्रिय वरिष्ठ नागरिक (एक्टिव सीनियर सिटीजन) वो है जो “व्यस्त रहे, मस्त रहे; चिंता मुक्त रहे और स्वस्थ रहे ” | इन्ही सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने अपने आपको स्वस्थ रखने का मंत्र खोजा है | मतलब न खाली रहो, न उदासी को पास आने दो और आलस्य से बचकर व्यायाम आदि में प्रातः काल का समय लगाओ | मै इसी के अनुसार पुरे वर्ष प्रातः 5:00 – 5:15 पर अपनी दैनिक चर्या शुरू करता हूँ | सुबह लगभग 40 मिनट तक व्यायाम करता हूँ और फिर पत्नी के साथ वॉक पर जाता हूँ | सुबह के नाश्ते के साथ टाइम पर दवा लेता हूँ |

स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम के साथ साथ मै अपने मनपसंद कार्य करता हूँ जैसे पठन, लेखन और पुराने गीत सुनता हूँ तथा घर के कार्यो में मदद करता हूँ | ये सब कुछ मुझे व्यस्त और मानसिक रूप से स्वस्थ रखता हैं |

मेरे हिसाब से मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए मनोरंजन भी बहुत ज़रूरी हैं |वैसे मैं बहुत फिल्मे नहीं देखता पर मनोरंजन के लिए कभी कभी परिवार के साथ देखने में अच्छा लगता हैं | “आनन्द -मठ” और “लगान” मेरी प्रिय फिल्म  हैं | इनमे मनोरंजन के साथ एक उददेश्य भी हैं |

आज से लगभग 20 -21 वर्ष पूर्व मेरे घुटनों में दर्द शुरू हुआ था | उस समय फ़िज़ियोथेरेपिस्ट ने कुछ व्यायाम बताये जो मैं आज तक लगातार कर रहा हूँ | इसी वजह से मैं सभी प्रकार के हड्डी व जोड़ों के दर्द से पूरी तरह से मुक्त हूँ | ये मेरे प्रयास व ईश्वर की कृपा दोनों का परिणाम है |

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मैं यदि अपना स्वयं का आकलन करुँ तो मैं अपने को 5 में से 3.5 अंक देना चाहूँगा स्वस्थ और एक्टिव रहने के लिए | मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि मैं जब तक जीवित रहूँ  स्वस्थ रहूँ  ताकि दूसरों पर बोझ बनने का अहसास न रहे |

भविष्य की योजनाएं

मैं चाहता हूँ कि अब अपने सम्पूर्ण परिवार के साथ जहाँ मैं नहीं जा सका वहाँ घूमने के लिए अवश्य ही जाऊ और कुछ नवीनता का अनुभव करुँ | इसके अलावा मैं अपने कविता लिखने के शौक को बरकरार रखना चाहता हूँ |

मेरा सन्देश

वैसे तो मेरे पास ज्यादा कुछ कहने के लिए नहीं है | मैं बचपन में मेरे दादा जी द्वारा सिखाई गयी दो बातें अवश्य बताना चाहुँगा- (1) दादा जी कहते थे कि जिस धन या वस्तु को हमने परिश्रम से अर्जित नहीं किया उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं हैं | उसे प्राप्त करना हमारे लिए अनैतिक है | (2) हमारे विचार और व्यवहार ऐसे हों कि हम न किसी को बद-दुआ दे और न ही किसी की बद-दुआ लें | मतलब हम भी सुख शांति से रहे और दूसरे भी सुखी रहे | हमारे ग्रन्थ भी हमें उदारता, सहनशीलता, व सहानुभूति की ही शिक्षा देते हैं |

मेरे विचार में जीवन में प्रसन्न रहने के लिए सादगी, स्वयं में संतुष्टि का भाव, दुसरो की सहायता करके प्रसन्न रहना एवं सहानुभूति का भाव आवश्यक  हैं |

 


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