मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी

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मेरा नाम नैपाल सिंह है और मैं  मेरठ ,उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ। मोती लाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज इलाहाबाद से बी.ई (मैकेनिकल इंजीनियरिंग) करने के बाद उत्तर प्रदेश सिचाई विभाग में कार्यरत रहा। नौकरी के दौरान टेहरी बाँध परियोजना, कालागढ़ बाँध परियोजना तथा विश्व बैंक वित्त पोषित गंगा कैनाल परियोजना पे काम करने का अवसर प्राप्त हुआ। अपनी नौकरी के दौरान इंजीनियर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट कालागढ़ में डिप्टी डायरेक्टर एडमिनिस्ट्रेशन का कार्यभार भी संभाला।

COLLAGE

मैं अब ७३ वर्ष का होने वाला हूँ। मेरा वजन पिछले ४७ वर्ष से ६५ किलोग्राम के आस पास ही स्थिर है। विद्यार्थी जीवन में काफी प्रयास के बावजूद मेरा वजन ४८ किलोग्राम से अधिक नही हो पाया था । शादी के बाद लगभग एक वर्ष में मेरा वजन ६५ किलोग्राम हो गया था जो अब तक लगभग स्थिर है। मैंने कभी नियमित व्यायाम / योग भी नही किया है। विद्यार्थी जीवन में दौड़ने में अवश्य रूचि लेता था। यह जरूर है कि मैं सदैव व्यसन रहित अर्थात कभी मदिरा , धूम्रपान अथवा अन्य नशे का प्रयोग नही किया। सदैव शाकाहारी रहा और अंडा तक भी नही खाया। मुझे बचपन में साथी अँधा कहकर भी चिढ़ाते थे (सम्भवत आँखे कुछ छोटी होने के कारण), लेकिन सौभाग्य से आज तक मैंने कभी चश्मा नही लगाया। रात्रि में भी समाचार पत्र पढ़ने / गाड़ी चलाने में कोई परेशानी नही होती। सिर के लगभग ९० % बाल काले हैं जब कि कभी तेल अथवा अन्य पदार्थ का प्रयोग नही किया। ऐसी आदतें बहुत मनुष्यों में मिल जाएंगी लेकिन ये आदत होते हुए भी उनका वजन अधिक हो जाता है। इन सब कथन से यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि स्वस्थ रहने अथवा मोटा न होने में व्यक्ति विशेष की शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) भी बहुत प्रभाव डालती है। मुझ पर भी इसी का प्रभाव अधिक प्रतीत होता है। कुछ वर्षो से जरूर कुछ योग /व्यायाम और कभी कभी घूम लेता हूँ।

मेरा जन्म अज्ञात तिथि को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपद मुज़फ्फरनगर के एक छोटे से ग्राम में गरीब किसान परिवार में हुआ, यद्यपि अभिलेखों में मेरी जन्म तिथि १४-०७-१९४५ अंकित है। काफी प्रयत्न करने पर भी वास्तविक जन्म तिथि जानने में मैं असमर्थ रहा। ८ संतानों में मैं सबसे छोटा था। माता पिता बिलकुल अशिक्षित थे। बड़े ५ भाईओं में से केवल एक भाई ने हाई स्कूल तक की शिक्षा प्राप्त की थी जो फौज में भर्ती हो गए थे। एक अन्य भाई भी १९३९ में आजाद हिन्द फौज में भर्ती हो गए थे जो ७ वर्ष बाद घर लौटे थे और जिन्हें बाद में स्वतंत्रता सेनानी का भी दर्जा मिला था । अन्य सभी भाई बहन या तो अशिक्षित थे अथवा हाई स्कूल भी नही कर पाए थे। माता जी को माँ और पिता जी को चाचा कहकर पुकारा करता था। वर्तमान में ८ भाई बहनो में मैं अकेला ही जीवित हूँ। जब मैं २५ वर्ष का था, पिता जी का स्वर्गवास हो गया था।

मेरे संघर्ष

घर में इतनी गरीबी थी कि पढाई के लिए आवश्यक खर्चे के लिए साहूकार से कर्ज पर उधार पैसे लेकर मुझे इलाहाबाद  भेजे जाते थे। साहूकारों से रुपए उधार मंगाने के लिए पिता जी अपने छोटे भाई जिनको मैं छोटे चाचा के नाम से पुकारता था, का सहारा लेते थे। इंजीनियरिंग की पढाई पूरी कर गाँव में एक माह रहने के बाद मुझे बम्बई एक मित्र के पास जाना था जिन्होंने मुझे वहां नौकरी दिलाने का भरोसा दिया हुआ था। उस समय पिता जी बीमार थे। बम्बई जाने के लिए पिता जी ने मुझे १८० रुपए जो उनकी कुल धरोवर थी, देकर विदा किया। बम्बई मैं कुल ३ माह रहा। बम्बई जाने के एक माह बाद पिताजी का स्वर्गवास हो गया। बम्बई में संतोषजनक नौकरी नहीं मिल पाई। केवल एक माह के लिए २०० रूपए की नौकरी मिली। पैसो का इतना अभाव था कि न तो पिता जी की अर्थी को कन्धा देने और न ही उनकी तेहरवी में आने के लिए रेल के किराए के पैसो का प्रबंध कर सका। अपने जीवन की झकझोर देने वाली घटना को अपने दिल में संजोग कर रखता हूँ और गरीबी की पराकाष्टा को परिचितों को बताने में परेहज नही करता बल्कि गर्व का अनुभव करता हूँ। बम्बई में मुझे एक रूपया प्रतिदिन में गुजारा करना पड़ा। एक रूपए में से ६ – ६ आने में दोनों समय का खाना, २ – २ आने में बस के किराए में व्यय करता था। मित्र की वजह से रहने पर कोई खर्च नही करना पड़ा क्योंकि उन्होंने अपने एक मित्र के खाली पड़े मकान को मुझे कुछ समय के लिए दिलवा दिया था।

मेरी पत्नी – मेरी सहभागी

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वर्ष १९७0 में नौकरी में आने के बाद १९७१ में मेरी शादी हुई। पत्नि का हर समय पूरा सहयोग मिलता रहा। मुझे याद है जब मेरी पोस्टिंग कानपुर में थी, तो उन्होंने पढाई छोड़ने के बीस वर्ष बाद पहले बी० एड०,फिर डी०ए०वी० कॉलेज कानपुर में एम्०ए० साइकोलोजी की कक्षाओं में नियमित रूप से उपस्थिति दर्ज कराते हुए किन किन परिस्थितिओं में दो बच्चो की गृहस्थी संभाली। कभी भी स्वयं नौकरी की लालसा न करते हुए पूरी नौकरी में प्रत्येक स्थान पर सदैव मेरे साथ ही रही। उनकी लगन से दोनों लड़के अच्छी नौकरी पर आज सपरिवार अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बड़ा लड़का १९९६ में बी०टेक० (कंप्यूटर) करके लगभग २० वर्ष से अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा में रहा है और अंत में टोरंटो कनाडा में स्थाई रूप से बस गया है। उसकी पत्नि भी अमेरिका मे कंप्यूटर से एम्०एस० करके टोरंटो में जॉब करती है। छोटा लड़का एम०डी०एस० करने के बाद एक स्थानीय डेंटल कॉलेज में विभागाध्यक्ष है, वह ३ वर्ष सऊदी अरब के एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी रह चूका है। सौभाग्य से छोटा लड़का हमारे साथ ही रहता है, उसकी पत्नि (डेंटिस्ट) अपना डेंटल क्लिनिक चलाती है।

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मेरे अनुभवों के आधार पर प्रसन्नता के तीन सूत्र

१-जीवन में प्रसन्न रहने के लिए आपसी संवाद बहुत आवश्यक है। यह संवाद परिवार के सदस्यों से, मित्रो से यहां तक कि अनजान से भी स्थापित किया जा सकता है। प्राय देखने को मिलता है कि अहंकार के कारण मनुष्य किसी से बात करने की पहल नही करता है। लेकिन यह जरूर चाहता है कि उससे कोई बात करे। यह अहंकार मनुष्य को अकेलेपन की ओर ले जाता है और बिमारिओं से घेर कर समय से पहले मृत्यु को बुलावा देता है। मेरा अनुभव यह बतलाता है कि एक वरिष्ट नागरिक अनजान वरिष्ट नागरिक से भी बात करने की पहल करता है तो अपने साथ साथ उसको भी प्रसन्नता मिलती है।

२ – धन की अधिक चाहत भी मनुष्य को दुखो की ओर अग्रसर करती है। विशेषकर अनैतिक तरीकों से कमाया गया धन मनुष्य के अंदर भय उत्पन्न करता है। इस भय / चिंता से कई बिमारिओं की उत्पत्ति होती है। गरीबो तथा जरुरतमंदो को दान देने से भी मन को शांति / प्रसन्नता मिलती है।

३- निस्वार्थ सामाजिक सेवा में भी मन को शांति / प्रसन्नता मिलती है।

स्वस्थ जीवन जीने का फिटनेस मंत्र

मैं सुबह ५ बजे उठकर दो गिलास पानी पीकर ६ बजे तक घूमता हूँ। फिर ७ बजे तक योग करता हूँ। ७ बजे से ८ बजे तक चाय बनाकर पीना,अखबार पढ़ना (हिंदी एवं अंग्रेजी ), ८ बजे से ८:३० बजे तक स्नान, ८:३० बजे के बाद नाश्ते में दूध, केला, बादाम, अखरोट को एक साथ मिलाकर शेक बनाकर पीना। दोपहर १२ : ३० बजे तक भोजन कर लेना , भोजन के बाद एक घंटा आराम , शाम को एक घंटा घूमना, रात को ८ बजे भोजन कर लेना , रात को साढ़े दस बजे तक सो जाना, दिन और रात के शेष बचे समय में सामजिक एवं कंप्यूटर पर बैठकर आवश्यक काम करना ही मेरी दिनचर्या है।टी वी में समाचार के अतिरिक्त कुछ नही देखता। बीच बीच में समय समय पर पत्नी से घरेलू कार्य से सम्बंधित बातों पर चर्चा कर लेता हूँ और अपनी ७ वर्ष की पोती के साथ खेलता हूँ। मैंने २० जून से एक वर्ष के लिए आम तथा मिठाई का परित्याग किया हुआ है। इससे पूर्व भी मैं ११ वर्ष तक चाय का, एक वर्ष तक मिठाई का परित्याग कर चुका हूँ।

अपना ज्यादा समय लैपटॉप पर बैठकर, सामाजिक कार्यो में व्यस्त रखकर व्यतीत करता हूँ। मुझे समय व्यतीत करने की कोई समस्या नही है। यह विडंबना ही है कि मुझे इतनी आयु में इंटरनेट में इतनी रुची है। इस आयु में यह रूचि बहुत कम व्यक्तिओं में देखने को मिलेगी। यह ठीक है कि इंटरनेट पर अधिक बैठने के कुछ नुक्सान अवश्य होते होंगे। लेकिन जब तक वे नुक्सान होना शुरू होंगे तब तक मैं संभवत स्वर्ग लोक सिधार जाऊँगा। मैं अपने अनुभव से यह कह सकता हूँ कि इस आधुनिक दुनिया में बिना कंप्यूटर / इंटरनेट की जानकारी के कोई भी शिक्षा अधूरी है। इस जानकारी से आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। मैं तो अपने साथी वरिष्ठ नागरिकों से यह कहते भी नही चूकता कि बिना इंटरनेट / कंप्यूटर की जानकारी के कोई भी व्यक्ति लगभग अनपढ़ समान है (जो मुझे नही कहना चाहिए)। जब जब मैं विदेश (कनाडा) जाता हूँ वहां भी कंप्यूटर की बदौलत समय काटने में कोई परेशानी नही होती।

भविष्य की योजनाएं

मैं गरीब और ज़रूरतमन्द लोगों की मदद हमेशा करना चाहता हूँ। जैसे मैं अभी तक व्यस्त रेहता आ रहा हूँ ऐसे ही भविष्य में रहना चाहता हूँ। निकट भविष्य में अर्थात अगले वर्ष मई , जून तक मुझे एवं पत्नी को कनाडा का पी०आर० मिल जाएगा, वहां जाने के बाद स्थानीय सामाजिक कार्यो से तो वंचित हो ही जाऊंगा, लेकिन इंटरनेट के माध्यम से ही अपने सहयोगिओं , सरकारी विभागों से संवाद, ऑनलाइन RTI आदि कार्यो में व्यस्त रहने का प्रयास करूँगा। मेरे मित्र श्री ए० एन० पांडेय जी (डायरेक्टर, स्पिरिचुअल अवेयरनेस प्रोग्राम, हैदराबाद) द्वारा दी गई एक जिम्मेदारी – उनकी योग की एक पुस्तक का हिंदी अनुवाद – का निर्वाह भी भविष्य की कार्ययोजना में है।

मेरा सन्देश

हमेशा खुद को अच्छे कार्यों में व्यस्त रखे और सन्तुष्ट रहे।

कुछ समय पूर्व मुझे रामा स्वामी द्वारा लिखित पुस्तक : Yoga and Psychotherapy पढ़ने का सुअवसर मिला। इस पुस्तक के पृष्ट १५१ पर कृष्णमूर्ति जी द्वारा लिखी निम्न पंक्तिओं ,जिन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया, को पुन लिख रहा हूँ – “You can not live if you can not die psychologically every minute.This is not an intellectual paradox . To live completely , wholly , everyday as if it were a new liveliness , there must be dying to everything of yesterday, otherwise you live mechanically.”


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